Friday, 22 March 2019 22-Mar-2019

Category: Hindi

एक और ग्रहण, शपथ-ग्रहण

Published by घनश्याम अग्रवाल on   February 15, 2019 in   Hindi

एक होता है चंद्रमा, एक होती है  धरती और एक होता है सूरज। इसी प्रकार एक होती है जनता, एक होता है नेता और एक होती है कुर्सी। चंद्रमा धरती से छोटा है, धरती सूरज से छोटी होती है, सूरज सबसे बडा होता है। जनता नेता से छोटी होती है, नेता कुर्सी से छोटा होता

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रंगों और रेखाओं का सांस्कृतिक विन्यास – ‘रंगोली’

Published by डॉ. दीप्ती गुप्ता on   January 29, 2019 in   Hindi

हमारी प्राचीन भारतीय संस्कृति की परंपरागत लोक-कला की अनेक धरोहरों में से एक धरोहर है ‘रंगोली’, जो ‘अल्पना’ के नाम से भी जानी जाती है। यह युगों से सांस्कृतिक आस्थाओं का प्रतीक रही है। मोहनजोदड़ो और हड़प्पा सभ्यता में भी रंगोली के प्राचीन रूप के दर्शन होते हैं। हमारे पुराणों में रंगोली से संबंधित अनेक

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सोशल मीडिया का गुलाम न बनें

Published by Anil Atri on   December 8, 2018 in   Hindi

सोशल मीडिया का गुलाम न बनें! पर क्यूँ?  कंप्‍यूटर के बाद मोबाइल क्रांति ने दुनिया को इतना सीमित कर दिया है कि कभी-कभी ऐसा लगता है कि सचमुच पूरी दुनिया हमारी मुट्ठी में कैद होकर रह गई है। इसके पहले तकनीक ने मानव जीवन को इस हद तक पहले कभी नहीं बदला था। आज हम

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रीमिक्स! यानी नई बोतल में पुरानी शराब

Published by Raviraj Pranami on   November 15, 2018 in   Hindi

संगीत साउंड इंजिनियरिंग के लगातार होते जा रहे विकास की कहानी है। जैसे जैसे म्यूजिक के री-प्रॉडक्शन का विज्ञान तरक्की करता गया म्यूजिक का स्वरूप बदलता गया। म्यूजिक के री-प्रॉडक्शन स्तर के हिसाब से रिकॉर्डिंग और मिक्सिंग होती रही। खासतौर पर फिल्मी गीतों में मिक्सिंग और री-मिक्सिंग तभी से होती आ रही है जबसे फिल्मों

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उनके बिना रहेंगे अपूर्ण

Published by Sudha Arora on   July 28, 2018 in   Hindi

हमारे यूनिवर्स में दो स्पेस हैं – एक बाहरी, एक भीतरी। बाहरी स्पेस को हमेशा भीतरी स्पेस से ज्यादा अहमियत दी गई। पुरुष बाहर गया, स्त्री के हिस्से घर की स्पेस आई। पैसा कमाने के लिए बाहर जाने-आने के बीच पुरुष के काम के घंटे निश्चित हुए, लेकिन स्त्री के काम की अवधि कभी तय

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तनाव की प्राकृतिक चिकित्सा

Published by Ramlubhaya Aroda on   June 7, 2018 in   2018Hindi

चिंता ज्वाल सरीर बन, दावा लगि लगि जाय। प्रकट धुआं नहिं देखिए, उर अंतर धुंधुवाय॥ उर अंतर धुंधुवाय, जरै जस कांच की भट्ठी। रक्त मांस जरि जाय, रहै पांजरि की ठट्ठी॥ कह ‘गिरिधर कविराय, सुनो रे मेरे मिंता। ते नर कैसे जिए, जाहि तन व्यापे चिंता॥ लोक भाषा के गिरधर कविराय की छह पंक्तियों की

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यथार्थ और आभास

Published by Bhuvendra Tyagi on   May 29, 2018 in   2018Hindi

तेज दौड़ती जिंदगी में यथार्थ और आभासी जीवन आपस में कुछ इस कदर घुल-मिल गई हैं कि उनमें अंतर बहुत महीन हो गया है। इसका असर व्यक्तियों और समाज पर लाजिमी तौर पर पड़ रहा है। फेसबुक और वाट्सएप जैसी सोशल मीडिया साइट्स ने लोगों को इस तरह अपनी गिरफ्त में ले लिया है कि

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सहज बने रहने में क्या है हर्ज…

Published by Suryabala on   April 14, 2018 in   2018Hindi

वर्धा से मुंबई की वह रेल यात्रा हमेशा याद रहेगी। अपनी बर्थ पर अकेली मैं और अगल बगल ऊपर नीचे की बर्थ पर तभी-तभी डिब्बे में घुसा एक मध्यवित्तीय महाराष्ट्रीयन परिवार। ठीक-ठाक सलवार, कुर्त्ते, चुन्नी वाली युवती मां, पिता, नौ दस वर्ष का बेटा और चार-छह की नन्हीं बेटी। कुछ बहुत आकर्षक या अनूठा जैसा

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भगवान बचाए इन हमदर्दों से

Published by Ghanshyam Agrawal on   February 19, 2018 in   2018Hindi

एक्सिडेंट के पश्चात जब मेरी आंख खुली, तो मैंने अपने आपको एक बिस्तर पर पाया। इर्द-गिर्द कुछ परिचित-अपरिचित चेहरे खड़े थे। मेरी आंख खुलते ही उनके चेहरों पर उत्साह व प्रसन्नता की लहर दौड़ गई। मैंने कराहते हुए पूछा-‘मैं कहां हूं?’ ‘आप सरकारी अस्पताल में हैं। आपका एक्सिडेंट हो गया था। घबराने की बात नहीं,

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मित्रता

Published by डॉ. दीप्ति गुप्ता on   January 30, 2018 in   2018Hindi

यूं तो मित्रता पर आज तक बहुत कुछ कहा और लिखा गया है, लेकिन इस मृदुल-मधुर भाव को आज के कलयुग में बार-बार रिफ्रेश करने की, पुनर्जीवित करने की महती आवश्यकता है। जीवन का सबसे सुंदर, सबसे बेहतरीन और सबसे प्यारा रिश्ता ‘मित्रता’- इसके बारे में इंसान या तो निःशब्द रहकर, इसके सुकून भरे एहसास

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