योग भगाये रोग

सृष्टी रचनाकाल से मानव आधि और व्याधि से दुख पाता रहा है । जब शरीर में कफ, वात और पित्त असंतुलित हो जाते हैं, तब शारीरिक रोग हुआ करते हैं । जब मन में चिंता, ग्लानि, व्देष, क्रोध और ईर्ष्या होती है, तब मानसिक रोग हुआ करते हैं । इन्हें मनोकायिक रोग कहा जाता है । आज का मानव मनोकायिक रोग से दुखी है ।

मनोकायिक रोगों से बचने, रोकने और दूर रखने का माध्यम है – पैर नरम, पेट नरम, सिर ठंडा, तन में आए रोग को मारो डंडा। …… अर्थात शरीर के आंतरिक और बाह्य अवयवों को सदा आराम देना चाहिए । पेट नरम अर्थात् संतुलित आहार हो। क्या खाना चाहिए, कितना खाना चाहिए, कब खाना चाहिए, क्यों खाना चाहिए । सर ठंडा अर्थात शांत, प्रसन्न, प्रफुल्लित, आनंदित रहना चाहिए । यदि इन तीन विषयों का पालन किया जाता है तो रोग का प्रभाव नहीं पड़ता । यह आरोग्यता का मूल मंत्र है ।

योग मानव जीवन का सरल और कुशल विज्ञान है, जो हमें धरोहर के रूप में प्राप्त है । हमारा हर क्षण यौगिक क्रियाओं से ओत-प्रोत है । हर प्राणी का जीवन प्राण से प्रारंभ होता है और प्राण से संचालित होता है तथा प्राण से समाप्त होता है । इसे योग की भाषा में प्राणायाम कहा जाता है अर्थात प्राण पर नियंत्रण ही जीवन है ।

हम लोग देखते हैं कि कछुआ अपने प्राण पर नियंत्रण रखता है और वह २००  से ३००  वर्षों तक जीवित रहता है, क्योंकि वह एक मिनट में केवल डेढ़ बार श्वास लेता है, और छोड़ता है, जबकि उसका साथी खरगोश एक मिनट में ४२ बार श्वास लेता है और छोड़ता है। परिणाम यह है कि वह केवल १४ वर्ष में मर जाता है । मानव भी २४  घंटे में २१६०० बार सांस लेता और छोडता है । यदि इसकी मात्रा बढ़ जाती है तो आयु घट जाती है और यदि श्वास की गति कम रहती है तो आयु बढ़ जाती है । मानव जीवन का हर क्षण श्वास की गति पर आधारित है ।हम कहां सोच पाते हैं, जब हमारी श्वास की गति रूक जाती है । अर्थात श्वास और प्रश्वास के बीच का समय सोचने का है । जब हम बंदूक से निशाना लगाते हैं, तो श्वास को रोक लेना पड़ता है । एक सुई के छिद्र में धागा डालने लगते हैं, तो वहां पर श्वास को रोक लेना पड़ता है ।श्वास-प्रश्वास अर्थात प्राणायाम पर नियंत्रण करना मन पर नियंत्रण पाना है । प्राणायाम का अभ्यास दैनिक और प्राकृतिक नियम है । प्राणायाम करने के पूर्व आसनों व्दारा शरीर के हर अंग को खिचाव, दबाव, झुकाव तथा मरोड़ देकर नरम तथा लचीला बनाया जाता है । ऐसा करने से हर अंग की कार्यक्षमता बढ़ जाया करती है । श्वास-प्रश्वास तथा रक्त वाहिनी नाड़ियों में संकुचन और विमोचन होने से रक्त का बहाव असुरक्षित रूप से होता रहता है तथा चर्बी के एकत्रित ना होने से ह्रदय रोग होने की संभावना बहुत कम हो जाती है । आसन, प्राणायाम करने के पूर्व भोजन पर ध्यान देना है । योग की मान्यता है कि जैसा खाएंगे अन्न, वैसा बनेगा मन । भोजन ही ब्रह्म है । योग कहता है कि आधा पेट भोजन अपने लिए खाया जाता है और जब आधा पेट से अधिक खाते हैं तो वह डॉक्टर के लिए हो जाता है।भोजन जीने के लिए खाया जाता है, खाने के लिए नहीं जीना चाहिए । सात्विक भोजन से आचार-विचार और व्यवहार भी सात्विक होते हैं ।इसलिए सात्विकता ही सफलता की कुंजी मानी गई है ।

हर व्यक्ति तीन प्रकार के दुखों से बचना चाहता है । शारीरिक, मानसिक और वाणी दुख। योग कहता है कि तीनों प्रकार के दुखों से बचना चाहिए अर्थात हिंसा नहीं करनी चाहिए, अहिंसा का पालन करना चाहिए। जिस प्रकार हिंसा दुख पहुंचाती है, ठीक उसी प्रकार से झूठ, चोरी, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह भी भयंकर दुख के कारण बन जाया करते हैं । सामाजिक जीवनप्रणाली व्दारा ही व्यक्तिगत सुख का लाभ प्राप्त होता है । योग व्दारा समझाए गए अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह सुखी जीवन के स्त्रोत हैं, जो आज के जीवन के लिए धरोहर के रूप में हम लोगों को प्राप्त हैं । सामाजीक तथा व्यक्तिगत जीवन को आदर्शमय बनाने के लिए हमें प्रतिपक्ष को अपनाना चाहिए । अर्थात हर परिस्थिती में उसके विरूदध भाव उत्पन्न करना चाहिए । क्रोध के समय करूणा का भाव, अहंकार के समय नम्रता और व्देष के समय दया का भाव । यह सुखमय जीवन का मूल मंत्र है । इसका पालन ही योग है।

एम.एस.सी. में पढ़ने वाला एक युवक मेरे पास आकर कहने लगा कि गुरूजी जब मैं किसी लड़की को देखता हूं तो मै विचलित हो जाता हूं। तब मैंने उससे कहा कि जब अपनी छोटी या बड़ी बहन को देखते हो तो कैसे भाव आते हैं । मैंने उससे कहा कि जब भी मन विचलित हो तब सोचो कि वह लड़की तुम्हारी बहन जैसी दिखती है । पांच दिन के बाद आकर कहने लगा कि गुरूजी मेरे मन में परिवर्तन आ गया है । प्रतिपक्ष भावना एक ऐसा उपकरण है, जिसके व्दारा अपने विचारों, बुदिध्, मन, इंद्रियों पर विजय पाई जा सकती है । व्यक्तिगत तथा सामाजिक जीवन को सफल बनाया जा सकता है । योग जीवन जीने का सरल विज्ञान है शरीर, मन, विचार, बुद्धि, इंद्रिय, भावना को पवित्र रखते हुए आत्मदर्शन तक पहुंचा जा सकता है । पुस्तक पढ़ने, प्रवचन सुनने, टीवी देखने से योग का लाभ नहीं होता  । उसे दैनिक जीवन में उतारना पड़ता है । एक दिन पिस्ता-बादाम वाला दूध पीने से केवल उसका स्वाद मिलता है । स्वस्थ, शक्तिशाली बनने के लिए नित्य योग के सिद्धांतों, पद्धतियों को अपनाना चाहिए।  योग की तुलना बरगद के वृक्ष से की गई है। जिस प्रकार बरगद की जड़ों से अनवरत जड़ों का निर्माण होता रहता है, ठीक उसी प्रकार योग गुण होता है । अभ्यासी को शारीरिक लाभ, मानसिक लाभ, भावनात्मक लाभ के साथ-साथ आत्मिक लाभ मिलता है, जो मोक्ष को प्राप्त कराता है


योगाचार्य हंसराज यादव

कालनिर्णय २०१६ – जुलै २०१७