बच्चों को नसीहत नहीं, सलाह दें !

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अक्सर माता-पिता अपने बच्चों का भला-बुरा सोचते समय इतने ‘पजेसिव’ हो जाते हैं कि अपनी हर बात उन पर थोपने लगते हैं । वे बच्चों के मन की थाह नहीं लेते । यह नहीं सोचते कि इसका उनके मन पर क्या असर होगा । ज्यादा टोका-टाकी या डांट-फटकार का उनके मन पर उलटा ही असर होता है । वे चिड़चड़े हो जातें हैं । एक मोड़ ऐसा आता है कि वे माता-पिता की बातों पर ध्यान देना ही बंद कर देते हैं । इससे टकराव और बढ़ जाता है ।

वेदांत दसवीं क्लास में पढ़ता है । दिन भर वह स्कूल और कोचिंग क्लास में व्यस्त रहता है । पढ़ाई में वह ठीक है । इसके बावजूद उसके माता-पिता उसे हर समय पढ़ते रहने को ही कहते रहते हैं । लगातार पढ़ाई में उसका मन नहीं लगता । तब उसे डांट पड़ती है । इससे उसका मन और उचट जाता है ।

मानसी आठवीं क्लास में पढ़ती है । उसकी मां हमेशा उसके कपड़ों पर नजर रखती है । कोचिंग क्लास में जाने के लिए ये क्यों पहना, खेलने जा रही है तो वो वाली ड्रेस क्यों नही पहनी, पार्टी में ये ड्रेस क्यों नहीं पहनी, पार्टी में ये ड्रेस पहनता है क्या कोई ? ऐसी बातें सुन-सुनकर वह इतनी परेशान हो चुकी है कि अब वह हर बार अपनी मां से पूछ लेती है कि क्या पहनूं । मगर उसके चेहरे पर पहले जैसी खुशी नजर नहीं आती ।

सुकेश होटल मैनेजमेंट में फर्स्ट ईयर का स्टूडेंट है । उसके घरवाले उसे मैनर्स की नसीहतें देते रहते हैं । हर बात का उल्टा जवाब देता है, सोचकर नहीं बोलता, बड़ों के पैर क्यों नहीं छूता, अपना सामान सही जगह रखा कर, कुछ डिसिप्लिन ला लाइफ में… ऐसे जुमले सुनकर वह अपने घरवालों से कटा-कटा सा रहने लगा है ।

हमारे पड़ोसी मेहता परिवार में बच्चों को बच्चा न समझकर उनसे बराबरी का व्यवहार किया जाता है । एक बार मैं उनके घर गया, तो वे अपने 15 साल के बेटे को कुछ इस तरह समझा रहे थे-

‘बेटा, आपको टैब की जरुरत नहीं है ।’

‘है पापा । मुझे जरुरत है ।’

‘क्या जरुरत है ?’

‘मैं अपना स्टडी मटीरियल रेफर कर सकता हूं उस पर । नेट सर्फ कर सकता हूं । गेम्स खेल सकता हूं । स्टडीज के लिए फ्रेंड्स से चैटिंग कर सकता हूं ।’

‘पर ये सब तो आप कंप्यूटर और लैपटॉप पर भी कर सकते हैं । स्मार्टफोन भी है आपके पास । अगर आपको सचमुच टैब की जरुरत होती, तो हम आपको जरुर दिला देते ।’

‘आप हमेशा ऐसे ही बोलते हो ।’

‘ऐसा नहीं है बेटा । आप सातवीं क्लास में थे, तभी हमने आपको स्मार्ट फोन दिला दिया था । आपके लिए वह जरुरी था । मैं और आपकी मम्मी, दोनों ऑफिस जाते हैं । टच में रहने के लिए आपको हमने फोन दिलाया था ना ?’

‘जी पापा ।’

मेहता साहब ने समझाकर अपने बेटे से बात की और वह मान गया ।

हालांकि, कई बार बच्चे इस तरह भी नहीं मानते । शिखा अपने घर वालों से जिद कर रही थी, दोस्तों के साथ 3 दिन के लिए पुणे जाने की । उसकी सहेली के परिवार का फॉर्महाउस है पुणे के पास । हालांकि, सब लड़कियां ही जाने वाली थीं, पर 16 साल की शिखा कभी अकेली बाहर नहीं गई थी । इसलिए उसके मम्मी-पापा तैयार नहीं हो रहे थे । उन्होंने उसे बहुत प्यार से समझाया कि वे अगले हफ्ते बेंगलुरु जाने ही वाले हैं, वहीं घूम लेना । वे इस पर भी तैयार हो गए कि उसे अपने साथ पुणे ले जाएंगे, सहेली के फॉर्महाउस में भी खुद छोड़ आएंगे, 3 दिन किसी होटल में रुककर खुद भी आसपास की जगहें घूम लेंगे और तीन दिन बाद उसे अपने साथ वापस मुंबई ले आएंगे । इसके लिए शिखा तैयार नहीं हुई । उसकी दलील थी कि इससे सहेलियों के सामने उसकी इंसल्ट होगी, वे चिढ़ाएंगी कि तेरे मॉम-डैड तो तुझ पर हमेशा नजर रखते हैं । काफी समझाने पर भी वह नहीं मानी । आखिर उसके माता-पिता को उसकी जिद माननी ही पड़ी । मगर एक बार हां कह देने के बाद उन्होंने मन में कोई डर नहीं रखा । उसे खुद दादर में लग्जरी बस में बिठाकर आए, जहां उसकी सहेलियां पहले से उसका इंतजार कर रही थीं । इसी तरह वे लड़कियां 3 दिन बाद लौट भी आईं ।

मैंने इस बारे में मेहता जी से पूछा, तो उन्होंने कहा, ‘आजकल बच्चे बहुत जिद्दी हो गए हैं । उनकी बात माननी ही पड़ती है । हम तो प्यार से समझाते हैं । वे मान जाएं, तो ठीक और नहीं मानें, तो भी ठीक । उनके न मानने पर हम उनकी बात मान लेते हैं ।’

‘पर इससे तो उन्हें पक्का हो जाता होगा कि ये समझा जरुर रहे हैं, पर बाद में हमारी बात मान ही लेंगे । ऐसे तो उनकी जिद और बढ़ जाती होगी ।’

‘नहीं । यह बात नहीं है । कभी कभी वे भी हमारी बात मान जाते हैं ।’

दरअसल शहरीकरण ने परिवारों के अनुशासन और अभिभावकों व बच्चों के रिश्तों पर बहुत असर डाला है… इनमें काफी तेजी से बदलाव आए हैं । संयुक्त परिवारों में बच्चों को प्यार-दुलार और डांट फटकार से ऊंच-नीच समझाने वाले और आखिर में डांट-फटकार से बचाने वाले कई लोग होते थे । एकल परिवारों के दौर ने बच्चों से यह मौका छीन लिया है । अब घर में बस माता-पिता हैं और बच्चे हैं । कोई और कड़ी नहीं है दोनों के बीच में… कोई बात फंस जाने पर बीच का रास्ता निकालने के लिए कोई भी नहीं है । ऐसे में किसी भी वजह से गतिरोध होने पर उसे दूर करने कौन आएगा ? कोई नहीं । इसलिए अब समय आ गया है कि माता-पिता अपने बच्चों से दोस्त की तरह व्यवहार करें, किसी भी मुद्दे पर उन्हें नसीहत नहीं, सलाह दें !


 – भूवेन्द्र त्यागी ( कालनिर्णय | सितंबर २०१७ )